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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 16, Verses 43–50

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 16, verses 43–50 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 16 · श्लोक 43-50

संस्कृत श्लोक

पक्षमासर्तुकटके दिनारे वर्षदण्डके । क्षणनाभौ स्पन्दमये कालचक्रे वहत्यथ ॥ ४३ ॥ अन्तर्धिमाजगामास्याः पत्युस्तच्चेतनं तनौ । संदृश्यमानमेवाशु शुष्कपत्ररसो यथा ॥ ४४ ॥ रणखण्डितदेहेऽस्मिन्मृतेऽन्तःपुरमण्डपे । निर्जला नलिनीवासौ परां म्लानिमुपाययौ ॥ ४५ ॥ विषोष्णश्वसनध्वस्तसकलाधरपल्लवा । प्राप सा मरणावस्थां सशल्येव मृगी यथा ॥ ४६ ॥ प्राप सा तमसान्धत्वं तस्मिन्मरणमागते । दीपज्वालालवे क्षीणे सद्मश्रीरिव भूषिता ॥ ४७ ॥ कार्श्यमाप क्षणेनासौ बाला विरसतां गता । यथा स्रोतस्विनी स्रोतक्षये क्षारविधूसरा ॥ ४८ ॥ क्षिप्रमाक्रन्दिनी क्षिप्रं मौनमूका वियोगिनी । बभूव चक्रवाकीव मानिनी मरणोन्मुखी ॥ ४९ ॥ अथ तामतिमात्रविह्वलां सकृपाकाशभवा सरस्वती । शफरीं ह्रदशोषविह्वलां प्रथमा वृष्टिरिवान्वकम्पत ॥ ५० ॥

हिन्दी अर्थ

इष्टदेवी के सन्तुष्ट होने के उपरान्त वह राजमहिषी जैसे गीत सुनने से हिरनी मारे खुशी के फूली नहीं समाती, वैसे ही मारे खुशी के आनन्द से विभोर हो गयी ॥ ४ २॥ पक्ष (पखवाडा) जिसका नेमिटक (अन्तिम गोलाकार हिस्सा) है, मास(महीना) जिसका मध्यकटक (बीच का गोलाकार हिस्सा) है और ऋतु जिसका नाभिकटक (बीच का गोलाकार हिस्सा है) है, दिन जिसके आरे हैँ यानी पहिये में लगी तिरछी सीकचें है ओर वर्ष जिसका अक्षदण्ड है ओर क्षण जिसकी नाभि (बीच का छेद) है, ऐसे वेग गामी कालरूपी चक्र (पिये) के चलने पर अर्थात्‌ क्षण, दिन, पक्ष, मास, ऋतु ओर वर्ण के क्रम से काल बीतने पर सूखे पत्ते के रस के समान उसके पति की चेतना देखते-ही-देखते शरीर में अन्तर्हित हो गयी । रणभूमि में शत्रुओं के प्रहारो से घायल राजा अन्तःपुर में मर गया । राजा के मरने पर रानी लीला जैसे जल न रहने से कमलिनी मुर््ञा जाती हे, वैसे ही अत्यन्त, म्लानवदन हो गई । विष के तुल्य उष्ण निःश्वास से उसका किसलय (नई कोपल) सदुश अधरपल्लव कुम्हला गया, वह बेचारी बाण से विध्य होने के कारण छटपटा रही हिरनी के समान मरणावस्था को प्राप्त हो गई | जैसे जले दीपक के प्रकाश से सुशोभित घर दीपक के बुझ जाने पर अन्धकार से व्याप्त हो जाता है, वैसे ही राजा के मर जाने पर रानी लीला अत्यन्त शोकाकुल हो गई। जैसे प्रवाह के सूख जाने पर नदी क्षीण हो क्षार से यानी रेह से धूसर हो जाती है, वैसे ही पतिके नष्ट होने पर वह सुन्दरी हतप्रभ हो क्षण भर में कृश हो गई । पहले पति का सम्मान करनेवाली और पति की मृत्यु से मरने को तैयार वह वियोगिनी बाला चकवी की नाई क्षण मेँ विलाप करती ओर क्षण में मूक हो जाती । तदुपरान्त जैसे तालाब के सूखने से व्याकुल हुई मछली के ऊपर ग्रीष्म के अन्त में हुई पहली वृष्टि कृपा करती है, वैसे ही पति की मृत्यु से अत्यन्त व्याकुल रानी लीला के ऊपर आकाशवाणी ने कृपा की, कारण कि पहले अनेक जन्मों से आराधित होने के कारण वह उसके ऊपर कृपालु थी