Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 17, Verses 26–31
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 17, verses 26–31 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 17 · श्लोक 26-31
संस्कृत श्लोक
यज्ञवाटपठद्विप्र जिततूर्याग्रनिःस्वनम् ।
बन्दिकोलाहलोल्लासप्रतिश्रुद्वनकुञ्जरम् ॥ २६ ॥
गेयवाद्योद्यतध्वानप्रध्वनद्गगनान्तरम् ।
हयहस्तिरथाराजिरजोमेघघनाम्बरम् ॥ २७ ॥
पुष्पकर्पूरधूपाढ्यं गन्धामोदितपर्वतम् ।
सर्वमण्डलसंभाररचितानेकशासनम् ॥ २८ ॥
यशःकर्पूरजलदसुशुभ्राम्बरपर्वतम् ।
रोदसीस्तम्भभूतैकस्वप्रतापजितार्ककम् ॥ २९ ॥
आरम्भमन्थरोदारकार्यसंव्यग्रभूमिपम् ।
नानानगरनिर्माणसोद्योगस्थपतीश्वरम् ॥ ३० ॥
पपाताथ महारम्भा सा तां नरपतेः सभाम् ।
व्योमात्मिका व्योममयीं मिहिकेवाम्बराटवीम् ॥ ३१ ॥
हिन्दी अर्थ
कतार लगाकर
खड़े हुए असंख्य राजा ओंकी कान्तिसे उसका सारा आँगन जगमगा रहा था, उसकी यज्ञशाला
में वेदमन्त्रों का उच्चारण कर रहे ब्राह्मणों ने तुरही, रणसिंगा आदि उत्तम बाजेके शब्दको दबा
दिया था, उसके वनगज बन्दियों के तीव्र शोर-गुल की प्रतिध्वनि कर रहे थे, उसकी संगीतशाला
के गायन ओर वादन के शब्दोंसे आकाश गूँज रहा था, चारों ओर घोडे, हाथी ओर रथों के ठट्ट
&, तत्वज्ञान से अज्ञान का विनाश होने पर द्रैत का उदय न होना ही जगत् की अत्यन्त अभावसम्पत्ति है ।
¬ यहाँ देहत्याग से स्थिर चित्त द्वारा अभिमान का त्याग ही विवक्षित है । मरण के समान बाहर निर्गमन नहीं ।
लगे थे, उनके एवं पैदल चलनेवाली जनताके चलनेसे उड़ी हुई धूलरूपी बादलों से आकाश
छा गया था। वह स्वयं पुष्प, कर्पुर ओर धूप से युक्त था ओर उसके पर्वताकार प्रासाद सुगन्धिसे
सराबोर थे। सम्पूर्ण मण्डलों से भेंटरूप धनको लाकर जो राजकीय कोषको परिपूर्ण रखते हैं,
उन सेवकों के लिए उसने अनेक प्रकार के शासन बना रखे थे। उसके अपने यशरुपी कर्पूर के
ढेर के तुल्य मेघरूपी अतिशुभ्र पर्वत अम्बरमें उत्पन्न हुए थे । स्वर्गलोक और भूलोक के
स्तम्भभूत अपने अद्वितीय प्रतापसे उसने सूर्य को भी मात कर दिया था, उसके अनेक सामन्त
आरम्भ में मन्दगति से चलनेवाले गुरूतर कार्यों में व्यग्र थे ओर उसके शिल्पी लोग नाना नगरों
के निर्माण में संलग्न थे। इस प्रकार विविध राजकार्यों में व्यस्त राजाको लीला ने देखा । इसके
अनन्तर जैसे कुहरा आकाशरूपी अरण्यभूमिमें गिरे, वैसे ही वासनामात्रशरीर होनेसे
आकाशरूपिणी चिदाकाशनिष्ठारूप विपुल आरम्भवाली लीला वासनामय होने के कारण
आकाशरूप राजाकी सभा में प्रविष्ट हुई