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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 17, Verses 32–36

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 17, verses 32–36 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 17 · श्लोक 32-36

संस्कृत श्लोक

भ्रमन्तीं तत्र तामग्रे ददृशुस्ते न केचन । संकल्पमात्ररचितां पुरुषाः कामिनीमिव ॥ ३२ ॥ तथा ते तां न ददृशुः संचरन्तीं पुरोगताम् । अन्यसंकल्परचितामन्येन नगरीं यथा ॥ ३३ ॥ प्राक्तनानेव तान्सर्वान्स्वान्ददर्श सभागतान् । भूभृतेव सुसंप्रज्ञान्नगरान्नगरान्तरम् ॥ ३४ ॥ तद्देशांस्तत्समाचारांस्तथा तानेव बालकान् । ता एव बालवनितास्तांस्तानेव च मन्त्रिणः ॥ ३५ ॥ तानेव भूमिपालांश्च तांस्तानेव च पण्डितान् । तानेव नर्मसचिवान्भृत्यांस्तानेव तादृशान् ॥ ३६ ॥

हिन्दी अर्थ

वहाँ वह सबके आगे घूमती थी, परन्तु वहाँ पर स्थित पुरूषों ने अपने आगे घूम रही केवल संकल्पसे कल्पित कामिनी की नाई, नहीं देखा। जैसे दूसरेके मनोरथ से रचित नगरको दूसरा नहीं देख सकता, वैसे ही अपने आगे- आगे घूम रही लीला को किसीने भी नहीं देखा | वहाँ लीला ने अपने उन्हीं पुराने सब लोगोंको सभामें बैठे देखा, जिन्हें वह पहले देखती थी, मानों वे सब-के-सब राजाके साथ ही एक नगर से दूसरे नगर में चले गये हों । जो पहले जहाँ पर बैठते थे वे उसी जगह पर बैठे थे, उन्हीं के सदृश उनका आचरण था । लीला ने, जिन्हें वह पहले देखती थी, उन्हीं बालकों को, उन्हीं विदूषकों को और उन्हीं अनुचरोंको, तथा उनसे मिलते-जुलते सेवकों को देखा