Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 18, Verses 16–17
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 18, verses 16–17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 18 · श्लोक 16,17
संस्कृत श्लोक
लीलोवाच ।
यथाहमिह तिष्ठामि त्वं च देवि स्थिताम्बिके ।
असावकृत्रिमः सर्ग इति देवेशि वेद्म्यहम् ॥ १६ ॥
यत्राधुना स भर्ता मे स्थितः सर्गः स कृत्रिमः ।
अहं मन्ये यतः शून्यो देशकालाद्यपूरकः ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
लीला ने कहा : हे देवि, जैसे मैं यहाँ पर बैठी हूँ और
आप भी स्थित हैं, इसे मैं अकृत्रिम सृष्टि समझती हूँ तथा जहाँ पर इस समय मेरे पति हैं, उस
सृष्टि को मैं कृत्रिम समझती हूँ, क्योंकि वह मिथ्याभूत है, अपनी स्थिति के लिए अपर्याप्त
देश, काल और व्यवहार की पूर्ति नहीं करती । जैसे दर्पण आदि में प्रतिबिम्बित और स्वप्न में
देखा गया पर्वत देश, काल और व्यवहार का पूरक नहीं है। (~)