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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 20, Verses 18–19

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 20, verses 18–19 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 20 · श्लोक 18,19

संस्कृत श्लोक

तस्य ब्राह्मणगेहस्य सशैलवनपत्तना । इयमन्तः स्थिता भूमिः संकल्पादर्शयोरिव ॥ १८ ॥ असत्यैवेयमाभाति सत्येव घनसर्गता । तस्मात्सत्यावभासस्य चिद्व्योम्नः कोशकोटरे ॥ १९ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे स्वप्न में त्रिभुवन है, जैसे संकल्प में तीनों जगत्‌ हैं, जैसे कथा का अर्थरूप संगम है, जैसे मरुभूमि मे जल है और जैसे संकल्प और दर्पण में अन्दर स्थित भूमि है, वैसे ही उस ब्राह्मण के घर की पर्वत, वन और नगर से युक्त यह भूमि असत्य है । इसलिए सत्य, ज्ञान चिदाकाश के कोश-कोटर में यह असत्यभूत घनसृष्टि पंचकोश के अन्तर्गत सत्य चिद्व्योमरूप निमित्त से सत्य-सी प्रतीत होती है