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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 20, Verses 16–17

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 20, verses 16–17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 20 · श्लोक 16, 17

संस्कृत श्लोक

प्राक्तनी सा स्मृतिर्लुप्ता युवयोरुदितान्यथा । स्वप्ने जाग्रत्स्मृतिर्यद्वदेतन्मरणमङ्गने ॥ १६ ॥ यथा स्वप्ने त्रिभुवनं संकल्पे त्रिजगद्यथा । यथा कथार्थसंग्रामो मरुभूमौ जलं यथा ॥ १७ ॥

हिन्दी अर्थ

यदि वे ही हम दोनों हैं, तो हम लोगों को उक्त वृत्तान्त का स्मरण क्यों नहीं होता और मरण का स्वरूप क्‍या है 7 हे अंगने, जैसे जाग्रत्‌-स्मृति स्वप्न में नष्ट हो जाती है और अन्य स्मृति उदित होती है, वैसे ही तुम लोगों की पूर्व जन्म की स्मृति नष्ट हो चुकी है और उससे विपरीत स्मृति उत्पन्न हुई है, यही मरण है