Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 20, Verses 29–35
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 20, verses 29–35 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 20 · श्लोक 29-35
संस्कृत श्लोक
यथैतत्प्रतिभामात्रं जगत्सर्गावभासनम् ।
तथैतत्प्रतिभामात्रं क्षणकल्पावभासनम् ॥ २९ ॥
क्षणकल्पं जगत्सर्वं त्वत्तामत्तात्मजन्मनाम् ।
यथावत्प्रतिभासस्य वक्ष्ये क्रममिमं शृणु ॥ ३० ॥
अनुभूय क्षणं जीवो मिथ्यामरणमूर्च्छनम् ।
विस्मृत्य प्राक्तनं भावमन्यं पश्यति सुव्रते ॥ ३१ ॥
तदेवोन्मेषमात्रेण व्योम्न्येव व्योमरूप्यपि ।
आधेयोऽयमिहाधारे स्थितोऽहमिति चेतति ॥ ३२ ॥
हस्तपादादिमान्देहो ममायमिति पश्यति ।
यदेव चेतति वपुस्तदेवेदं स पश्यति ॥ ३३ ॥
एतस्याहं पितुः पुत्रो वर्षाण्येतानि सन्ति मे ।
इमे मे बान्धवा रम्या ममेदं रम्यमास्पदम् ॥ ३४ ॥
जातोऽहमभवं बालो वृद्धिं यातोऽहमीदृशः ।
बान्धवाश्चास्य मे सर्वे तथैव विचरन्त्यमी ॥ ३५ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे यह जगत्-सृष्टि की प्रतीति कल्पनामात्र है, वैसे ही
यह क्षण, कल्प आदि की प्रतीति भी कल्पनामात्र ही है, वास्तविक नहीं है। क्षण, कल्प आदिरूप
सम्पूर्ण जगत् “त्वम्, "अहम्" इत्यादि अध्यास के अधीन स्वजन्मरूप भ्रमवाले पुरूषों को ही
प्रतीत होता है, उक्त प्रतीति के क्रम को मैं तुमसे यथार्थरूप से कहूँगी, तुम सुनो । पतिव्रते,
जब जीव क्षण भर मिथ्याभूत मरण-मूर्छना का अनुभव कर, पूर्वजन्म के पदार्थों को भूल कर
अन्य पदार्थो को देखता है, तभी आकाशरूपी वह चिदाकाश में, पलक भर में, यह मैं
आधेयस्वरूप हूँ और इस आधार में स्थित हूँ, ऐसा स्मरण करता है यानी उसके चित्त में उक्त
संस्कार उद्भूत होता है ओर वह देखता है कि मेरा यह शरीर हस्त, पाद आदि से सम्पन्न है ।
जैसा उसके चित्त में संस्कार रहता है, वैसा ही वह अपने शरीर को देखता हे । इस पिता का मैं
पुत्र हूँ, मुझे इतने वर्ष हो गये हैं, ये मेरे रमणीय भाईबन्धु है और यह मेरा रमणीय घर हे मैं
उत्पन्न हुआ, बालक हुआ, बढ़ा और अब ऐसा हूँ और ये सब मेरे बन्धु-बान्धव भी मेरे तुल्य
ही उत्पन्न हुए बालक हुए, बढ़े और अब मेरे सदुश ही विचरण करते हैं