Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 21, Verse 10
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 21, verse 10 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 21 · श्लोक 10
संस्कृत श्लोक
प्रतिभासत एवेदं केषांचित्सरणं विना ।
चिदणूनां प्रजेशत्वं काकतालीयवद्यतः ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
काकतालीय के समान किन्हीं चिदणुओं को पूर्व में अननुभूत ब्रह्मत्व, स्मरण
के बिना ही, प्रतीत होता है । भाव यह है कि जैसे कौए का जाना और ताल-फल का गिरना,
इन दोनों का कार्यकारणभाव नहीं हे, किन्तु काकगमन और फलपतन आकस्मिक है, वैसे
ही कुछ चैतन्य परमाणुओं को मैं ब्रह्मा हूँ, यह स्मरण पूर्वानुभव के बिना ही अवभासित
होता है । उसको पूर्वजन्म के प्रजेशत्व (ब्रह्मात्व) का स्मरण होता है, यह तो कह नहीं
सकते, क्योकि सहसिद्धं चतुष्टयम्“ (तत्त्वज्ञान, सृष्टिकरणसामर्थ्य आदि ब्रह्मा के
स्वाभाविक धर्म हैं) इत्यादि स्मृति से ब्रह्मा में अवश्य ज्ञानोदय होने पर उसका पुनर्जन्म
नहीं हो सकता