Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 21, Verses 28–29
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 21, verses 28–29 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 21 · श्लोक 28,29
संस्कृत श्लोक
श्रीदेव्युवाच ।
अचेत्यचिद्रूपमयीं परमां पावनीं दृशम् ।
अवलम्ब्येममाकारमवमुच्य भवामला ॥ २८ ॥
ततः प्राप्स्यस्यसंदेहं व्योमात्मानं नभःस्थितम् ।
भूमिष्ठनरसंकल्पो गगनान्तः पुरं यथा ॥ २९ ॥
हिन्दी अर्थ
हे देवी, जिस घर में वह ब्राह्मण ब्राह्मणी के साथ रहता था, उस
सृष्टि में पर्वतीय ग्राम में मुझे ले चलिये, उसे मैं देखती हू | २७॥ श्रीदेवीजी ने कहा : सुन्दरी,
परम पवित्र जो चेत्यशून्य चिन्मय दृष्टि (कारण ब्रह्मरूपता) है, उसका अवलम्बन कर इस
आकार का त्याग कर निर्मल होओ | भाव यह कि उसके अवलोकन के लिए समाधि द्वारा पहले
की नाई इस शरीर का भूल जाना परम आवश्यक है। तदनन्तर तुम मायाकाशरूप चिदाकाश
में स्थित उस सृष्टि को अवश्य प्राप्त होओगी जो कि भूमि में स्थित मनुष्यों के संकल्प (मनोरथ)
की नाई ओर आकाश के अन्तःपुर की नाई है