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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 21, Verses 30–31

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 21, verses 30–31 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 21 · श्लोक 30,31

संस्कृत श्लोक

एवं स्थिते तं पश्यावः सह सर्गमनर्गलम् । अयं तद्दर्शनद्वारे देहो हि परमार्गलम् ॥ ३० ॥ लीलोवाच । अमुना देवि देहेन जगदन्यदवाप्यते । न कस्मादत्र मे युक्तिं कथयानुग्रहाग्रहात् ॥ ३१ ॥

हिन्दी अर्थ

तुम्हारे पूर्वोक्त प्रकार से निर्मल होने पर हम दोनों साथ-साथ किसी प्रकार के प्रतिबन्ध २> “केचन” के स्थान मेँ "काचन" पाठ बहुधा उपलब्ध होता है । उक्त पाठ में ऐसा अर्थ करना चाहिए । विश्व का आत्यन्तिक विस्मरण मोक्ष कहा जाता है, उक्त अवस्था में प्रिय ओर अप्रिय नहीं होते, क्योकि “अशरीरं बाबा” ऐसी श्रुति है । क्यों नहीं होते ऐसी आकांक्षा होने पर कहती हैं- “काचन” । मोक्षावस्था में जो चिति अवशिष्ट रहती है, वह किसकी है, विषय की है या भोक्ता की है ? जिसके कारण प्रिय ओर अप्रिय होंगे ? भगवती श्रुति ने भी कहा है- "यत्र त्वस्य सर्वमात्मैवाभूत्‌ तत्केन कं पश्येत्‌" (जिस मोक्ष दशा में इसका सब कुछ आत्मा ही हो गया, वहाँ किसको किससे देखेगा) इत्यादि | से शून्य उस सृष्टि को देखेंगे। उस सृष्टि के दर्शनरूप महल के द्वार में यह शरीर का बड़ा भारी प्रतिबन्ध है, इस शरीर के रहते उसका दर्शन कदापि नहीं हो सकता, यह भाव है । लीला ने कहा : हे देवी, इस शरीर से दूसरी सृष्टि क्‍यों प्राप्त नहीं होती ? इसमें क्या युक्ति है इस बात को कृपाकर आप मुझसे कहिये