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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 21, Verses 38–39

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 21, verses 38–39 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 21 · श्लोक 38,39

संस्कृत श्लोक

यावदभ्यासयोगेन न शान्ता भेदधीस्तव । नूनं तावदतद्रूपा न ब्रह्म परिपश्यसि ॥ ३८ ॥ तत्र रूढिमुपायाता य इमे त्वस्मदादयः । अभ्यासाद्ब्रह्मसंपत्तेः पश्यामस्ते हि तत्परम् ॥ ३९ ॥

हिन्दी अर्थ

अभ्यास न होने के कारण जबतक तुम्हारी भेदबुद्धि शान्त नहीं होती, तबतक तुम निश्चय अब्रह्मरूप (ब्रह्मभिन्‍न देह आदि में आत्मबुद्धि करने के कारण देह आदिरूप) हो, अतएव तुम ब्रह्म को नहीं देख सकती । ब्रह्मज्ञान का बार-बार अभ्यास करने के कारण उक्त अर्थ में (उद्वत ब्रह्म में) जो अत्यन्त व्युत्पन्न हो गये हैं, ऐसे हम लोग उस परम पद का साक्षात्कार करते हैं