Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 21, Verses 52–53
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 21, verses 52–53 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 21 · श्लोक 52
संस्कृत श्लोक
यथा जलं जलेनाग्निरग्निना वायुनानिलः ।
मिलत्येवमतो देहो देहैरन्यैर्मनोमयैः ॥ ५२ ॥
नहि पार्थिवतासंविदेत्य पार्थिवसंविदा ।
एकत्वं कल्पनाशैलशैलयोः क्वाहतिर्मिथः ॥ ५३ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि ऐसी बात है तो मेरे पति की संकल्पजनित सृष्टि से इसका (मेरी देहका) संयोग कैसे
हुआ, इस पर देवीजी कहती हैं।
जैसे जल जल में मिल जाता है, अग्नि अग्नि से मिल जाती है, वायु वायु से मिल जाती है,
वैसे ही यह तुम्हारी देह मनोमय देहों से और अन्य वस्तुओं से मिल जाती है