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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 21, Verse 58

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 21, verse 58 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 21 · श्लोक 58

संस्कृत श्लोक

श्रीदेव्युवाच । यदस्ति नाम तत्रैव नाशानाशक्रमो भवेत् । वस्तुतो यच्च नास्त्येव नाशः स्यात्तस्य कीदृशः ॥ ५८ ॥

हिन्दी अर्थ

तत्त्वज्ञानी का शरीर ज्ञान से बाधित हो जाता है, अतः वह जले हुए वस्त्र के समान है ही नहीं। केवल पूर्वकाल की वासनामात्र से वस्त्राभास की नाई प्रतीत होने पर भी वासना के ओर सूक्ष्म होने पर उससे भी अधिक सूक्ष्म हो जाता है, इसलिए वह आतिवाहिकता (सूक्ष्मता) को ही प्राप्त होता है, विनाश को प्राप्त नहीं होता, इस आशय से देवी ने उत्तर दिया । जो वस्तु है उसीमें नाश और नाश के अभाव का क्रम होता है जो पदार्थ वास्तव में है ही नहीं, उसका नाश कैसा ?