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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 21, Verses 65–68

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 21, verses 65–68 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 21 · श्लोक 65-67

संस्कृत श्लोक

श्रीदेव्युवाच । कटकत्वं यथा हेम्नि तरङ्गत्वं यथाम्भसि । सत्यत्वं च यथा स्वप्नसंकल्पनगरादिषु ॥ ६५ ॥ नास्त्येव सत्यनुभवे तथा नास्त्येव ब्रह्मणि । कल्पनाव्यतिरिक्तात्मतत्स्वभावादनामयात् ॥ ६६ ॥ यथा नास्त्यम्बरे पांसुः परे नास्ति तथा कला । अकलाकलनं शान्तमिदमेकमजं ततम् ॥ ६७ ॥ यदिदं भासते किंचित्तत्तस्येव निरामयम् । कचनं काचकस्येव कान्तस्याऽतिमणेरिव ॥ ६८ ॥

हिन्दी अर्थ

तुमने ऊपर जो दोष कहा है, वह विकार को सत्य मानने पर ही होता है, मिथ्या मानने पर नहीं होता, इस प्रकार लीला द्वारा उपस्थापित दोषका देवीजी परिहार करती हैं । जैसे सुवर्ण में कटकत्व (वलयत्व) है ही नहीं, जैसे जल में तरंगत्व है ही नहीं और जैसे स्वप्न के नगर ओर मनोरथ से कल्पित नगर आदि में सत्यता है ही नहीं, वैसे ही सत्‌-चित्‌ आनन्द ब्रह्म मेँ कल्पनासे अतिरिक्त स्वरूप एवम्‌ निर्दोष उसके स्वभाव से पृथक्‌ कोई भी वस्तु नहीं हे । जैसे आकाश में धूलि नहीं है वैसे ही परब्रह्ममें कलन नामक प्रथम विकार नहीं हैँ । विषयशून्य, शान्त अविनाशी अद्वितीय ब्रह्म सर्वत्र व्याप्त हे