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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 21, Verse 69

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 21, verse 69 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 21 · श्लोक 69

संस्कृत श्लोक

लीलोवाच । एतावन्तं चिरं कालमेते देवि वयं वद । भ्रामिताः केन नामापि द्वैताद्वैतविकल्पनैः ॥ ६९ ॥

हिन्दी अर्थ

जो कुछ भी यह दृश्य प्रपंच प्रतीत हो रहा है, वह सब ब्रह्म का विशुद्ध विकास है। पर जैसे श्रेष्ठ चन्द्रकान्त मणि भ्रमवश काचकी नाई प्रतीत होती है वैसे ही ब्रह्म के विशुद्ध विकास की दृश्यरूप से प्रतीति हो रही है ॥६ ८॥ अब लीला उक्त भ्रम का कारण पूछती है । लीला ने कहा : हे देवि, कृपाकर आप बतलाइए कि हम लोगों को इतने सुदीर्घ काल तक किसने द्वैत और अद्वैत के विविध विकल्पों द्वारा भ्रम मे डाल रक्खा है ?