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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 21, Verses 76–79

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 21, verses 76–79 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 21 · श्लोक 76-79

संस्कृत श्लोक

अत्यन्ताभावसंपत्तौ द्रष्टृदृश्यदृशां मनः । एकध्याने परे रूढे निर्विकल्पसमाधिनि ॥ ७६ ॥ वासनाक्षयबीजेऽस्मिन्किंचिदङ्कुरिते हृदि । क्रमान्नोदयमेष्यन्ति रागद्वेषादिका दृशः ॥ ७७ ॥ संसारसंभवश्चायं निर्मूलत्वमुपैष्यति । निर्विकल्पसमाधानं प्रतिष्ठामलमेष्यति ॥ ७८ ॥ विगतकलनकालिमाकलङ्का गगनकलान्तरनिर्मलाम्बनेन । सकलकलनकार्यकारणान्तः कतिपयकालवशाद्भविष्यसीति ॥ ७९ ॥

हिन्दी अर्थ

अध्ययनरूप परम निर्विकल्प समाधि के मन में आरूढ होने पर द्रष्टा, दुश्य और दृष्टि का अत्यन्त अभाव होने पर, हृदय में इस वासनाक्षयरूप बीज के कुछ अंकुरित होने पर राग, द्वेष आदि दृष्टियाँ क्रमशः उदय को प्राप्त नहीं होंगी और संसार की उत्पत्ति भी निर्मूल हो जायेगी एवं निर्विकल्प समाधि परम स्थिरता को प्राप्त होगी । इस प्रकार निर्विकल्प समाधि के स्थिर होने से कुछ समय के बाद मायाकाश और उसके कार्यो के अधिष्ठानस्वरूप निर्मल आत्मा के अवलम्बनसे (साक्षात्कार से) तुम भ्रान्तिज्ञान रूप कालिमा से रहित अतएव कलंकशून्य होकर सम्पूर्ण प्राणियों की भ्रान्तियों का, उनकी कार्यभूत वासनाओं का ओर उनकी कारण अविद्या का अवसान भूत (बाध की अवधिरूप) मोक्षरूप हो जाओगी