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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 22, Verse 1

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 22, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 22 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

श्रीदेव्युवाच । यथा स्वप्नपरिज्ञानात्स्वप्नदेहो न वास्तवः । अनुभूतोऽप्ययं तद्वद्वासनातानवादसन् ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

परिपक्व ज्ञान होने से पूर्व कही गईं स्थूल देहता की निवृत्ति ओर आतिवाहिकता की प्राप्ति को दृष्टान्तो द्वारा बतलाने के लिए देवीजी प्रस्तुत होती है । श्रीदेवीजी ने कहा : भद्रे, यद्यपि स्वप्नावस्था में स्वप्न के शरीर का अनुभव होता है, तथापि यह स्वप्न है, इस परिज्ञान से जैसे स्वप्नदेह वास्तविक नहीं रहती, मिथ्या ठहरती है, वैसे ही यद्यपि इस स्थूलदेह का पहले अनुभव होता है, तथापि वासनाओं का क्षय होने से यह स्थूल शरीर बाधित हो जाता है

सर्ग सन्दर्भ

इक्कीं सर्वौ सर्ग समाप्त बाईसवाँ सर्ग तुरीय अवस्था, जीवन्मुक्त की स्थिति, वासनाओं के क्षयका उपाय ओर उसके अभ्यास का प्रतिपादन |