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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 22, Verse 2

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 22, verse 2 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 22 · श्लोक 2

संस्कृत श्लोक

यथा स्वप्नपरिज्ञानात्स्वप्नदेहः प्रशाम्यति । वासनातानवात्तद्वज्जाग्रद्देहोऽपि शाम्यति ॥ २ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे स्वप्न के ज्ञानसे स्वप्न देह लापता हो जाती है, वैसे ही वासनाओं के क्षीण होने से जाग्रत देह (स्थूलदेह) भी शान्त हो जाती है, नष्ट हो जाती है