Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 22, Verses 3–4
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 22, verses 3–4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 22 · श्लोक 3,4
संस्कृत श्लोक
स्वप्नसंकल्पदेहान्ते देहोऽयं चेत्यते यथा ।
तथा जाग्रद्भावनान्ते उदेत्येवातिवाहिकः ॥ ३ ॥
स्वप्ने निर्वासनाबीजे यथोदेति सुषुप्तता ।
जाग्रत्यवासनाबीजे तथोदेति विमुक्तता ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे स्वप्न में प्रतीयमान स्वप्नदेह का ओर मनोरथ द्वारा कल्पित कल्पनामय देह का
विनाश होने पर इस देह का (जाग्रत देह का) भान होता है, वैसे ही जाग्रद्भावना का (स्थूलदेह
में अहंभावना का) समूल उच्छेद हो जाने पर आतिवाहिक देह का उदय होता है । जैसे
स्वप्नावस्था के वासनारूपी बीज (२) से निर्मुक्त होने पर सुषुप्ति का उदय होता हे यानी
जब तक स्वप्न में वासना रहेगी, तब तक सुषुप्ति का आविभव नहीं हो सकता, वैसे ही
जाग्रदावस्था के वासनारूपी बीजों से शून्य होने पर जीवन्मुक्ति का उदय होता है