Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 22, Verse 30
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 22, verse 30 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 22 · श्लोक 30
संस्कृत श्लोक
दृश्यासंभवबोधेन विना द्वेषादितानवम् ।
तप इत्युच्यते तस्मान्न ज्ञानं तच्च दुःखतत् ॥ ३० ॥
हिन्दी अर्थ
यह सम्पूर्ण दृश्य मिथ्या है, इस प्रकार के दृढज्ञान से राग आदि का विनाश होने पर ही वह
(आत्मरति) ज्ञानोपयोगिनी होती हे, अतः उक्त याग आदि का उच्छेद होने पर ही वह ब्रह्माभ्यास
है, अन्यथा नहीं, ऐसा कहते हैं।
दृश्य के असंभव का ज्ञान हुए बिना उत्पन्न जो राग, द्वेष आदि का अपक्षय है, वह तप
कहलाता है, अतएव वह ज्ञान नहीं है, वह तप वृथा द्वेषआदि के रोकने से उत्पन्न दुःख को ही
बढ़ाता है