Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 24, Verses 4–6
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 24, verses 4–6 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 24 · श्लोक 4-6
संस्कृत श्लोक
शृङ्गस्थनिर्मलाम्भोदपीनोदरसुधालये ।
विशश्रमतुराशासु पूर्णचन्द्रोदरामले ॥ ४ ॥
सिद्धगन्धर्वमन्दारमालामोदमनोहरे ।
चन्द्रमण्डलनिष्क्रान्ते रेमाते मधुरानिले ॥ ५ ॥
सस्नतुर्भूरिघर्मान्ते तडिद्रक्ताब्जसंकुले ।
सरसीव जलापूरमन्थरे मेघमण्डले ॥ ६ ॥
हिन्दी अर्थ
चन्द्रमा के मध्य के सदृश उज्ज्वल उन
दोनों ने दिशाओमें सुमेरु आदि पर्वतोके शिखरो मेँ स्थित शुभ्र मेघों के विशाल कलेवर के
भीतर विद्यमान महलों में विश्राम किया। कहीं पर (चन्द्रमण्डल के समीप में) चन्द्रमण्डल से
निकलकर उन दोनों ने सिद्ध ओर गन्धर्वो के गले में पडी हुई मदारमालाओं की अति सुगन्धि
से मनोहर, मंद ओर सुगन्धित वायु में विचरण किया, कहीं पर प्रचुर ताप का विनाश करनेवाले
बिजलीरूपी लाल कमलो से व्याप्त तथा जल से पूर्ण होने के कारण मन्दगामी मेघमण्डल में
स्नान किया जैसे कि लोग प्रचुर ताप का अन्त करनेवाले बिजली के तुल्य उज्ज्वल कमलो से
पूर्ण तालाब में स्नान करते हैं