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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 27, Verses 1–3

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 27, verses 1–3 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 27 · श्लोक 1-3

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । तस्मिन् गिरितटे ग्रामे तस्य मण्डपकोटरे । अन्तर्धिमाश्वाययतुस्तत्रस्थे एव ते स्त्रियौ ॥ १ ॥ अस्माकं वनदेवीभ्यां प्रसादः कृत इत्यथ । शान्तदुःखे गृहजने स्वव्यापारपरे स्थिते ॥ २ ॥ मण्डपाकाशसंलीनां लीलामाह सरस्वती । व्योमरूपा व्योमरूपां स्मयात्तूष्णीमिव स्थिताम् ॥ ३ ॥

हिन्दी अर्थ

श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स श्रीरामचन्द्रजी, उस पर्वतशिखर के ग्राम में उस ब्राह्मण के घर के मण्डपाकाश में ही वहाँ पर ज्येष्ठशर्मा आदि के सामने स्थित वे दोनो ललनाएँ शीघ्र अन्तर्हित हो गई । हम लोगों पर वनदेवियों ने अनुग्रह किया, ऐसा विचार कर ज्येष्ठशर्मा आदि घर के लोगों का दुःख मिट गया ओर वे अपने गृहकृत्य में संलग्न हो गये । तदुपरान्त गृहमण्डपाकाश में अन्य लोगों की दृष्टि में अन्तर्हित विस्मय से चुपचाप-सी बैठी हुई व्योमरूपिणी लीला से व्योमरूपा (शून्यरूप संकल्पशरीरवाली) सरस्वती ने कहा

सर्ग सन्दर्भ

छल्बीसर्वो सर्ग समाप्त यत्ताईसवाँ सर्ग आश्चर्यमग्न लीला द्वारा फिर अपने पति के दर्शन की अभिलाषा व्यक्त करना तथा सरस्वती देवी के उपदेश से बोध प्राप्त कर अपने पूर्व जन्मों का वर्णन करना ।