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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 26, Verse 57

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 26, verse 57 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 26 · श्लोक 57

संस्कृत श्लोक

बोधो हि चेतति यथैव तथा शुभानि सूक्ष्मस्तु खादपि तथातितरां विशुद्धः । सर्वत्र राघव स एव पदार्थजालं स्वप्नेषु कल्पितपुरेष्वनुभूतमेतत् ॥ ५७ ॥

हिन्दी अर्थ

पहले जैसे ही पदार्थो का चिन्तन करता हे, वैसे ही पदार्थ शीघ्र आभासित होते हैं । बोध स्वयं आकाश से भी सूक्ष्म तथा अत्यन्त शुद्ध है । बोध ही सर्वत्र पदार्थसंघ है, स्वप्नो में ओर कल्पित नगरों मे यह बात शतशः अनुभूत है