Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 27, Verses 8–9
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 27, verses 8–9 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 27 · श्लोक 8,9
संस्कृत श्लोक
श्रीसरस्वत्युवाच ।
अभ्यासेन विना वत्से तदा ते द्वैतनिश्चयः ।
नूनमस्तंगतो नाभून्निःशेषं वरवर्णिनि ॥ ८ ॥
अद्वैतं यो न यातोऽसौ कथमद्वैतकर्मभिः ।
युज्यते तापसंस्थस्य च्छायाङ्गानुभवः कुतः ॥ ९ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीसरस्वलीजी ने कहा : वत्से, उस समय अभ्यास न होने के कारण तुम्हारा द्वैतज्ञान (प्रपंच
सत्य है इत्याकारक ज्ञान) निःशेष नष्ट नहीं हुआ था । जो पुरुष भेदक अविद्या के उच्छेद से
अद्वैत को प्राप्त नहीं हुआ है, उसका सत्यसंकल्पत्व आदि क्रियाओं से केसे सम्बन्ध हो सकता
है ? धूप में बैठे हुए पुरुष को छाया में बैठे हुए पुरुष का शीतलता का अनुभव कैसे हो सकता
है?