Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 3, Verses 1–2

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 3, verses 1–2 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 3 · श्लोक 1,2

संस्कृत श्लोक

श्रीराम उवाच । एवमेव मनः शुद्धं पृथ्व्यादिरहितं त्वया । मनो ब्रह्मेति कथितं सत्यं पृथ्व्यादिवर्जितम् ॥ १ ॥ तदत्र प्राक्तनी ब्रह्मन्स्मृतिः कस्मान्न कारणम् । यथा मम तवान्यस्य भूतानां चेति मे वद ॥ २ ॥

हिन्दी अर्थ

“मनोमात्रं च संकल्पः पृथ्व्यादिरहिताकृति: ।* इस प्रकार पीछे (यो.वा. 3-२-४९) कही गईं रीति से ब्रह्मा को यदि मनोरूप माने, तो मन के वासनासमूहरूप होने से प्राक्तनं वासनाजालं किचिदस्य न विद्यते“ (यो. वा. - २-४१) यह कथन असंगत होगा, ऐसा समझ रहे श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : हे ब्रह्मन्‌, आपने जो ब्रह्माका मन शुद्ध पृथिवी आदि से रहित कहा, वह वैसा ही प्रसिद्ध है । परन्तु इस विषयमें शंका यह होती है कि यदि पृथिवी आदि से रहित मन ब्रह्मा है, यह सत्य है, तो जैसे आपके, मेरे, अन्य पुरुष के ओर पशु आदि के शरीर में पूर्वस्मृति कारण है वैसे ही ब्रह्मा के शरीर में पूर्वशरीर के त्याग के समय उत्पन्न स्मृति कारण क्यों नहीं है ? क्योकि “यं यं वाऽपि स्मरन्‌ भावम्‌" इत्यादि स्मृति है । यदि ब्रह्मा के शरीर में प्राक्तन स्मृति है, तो प्राक्तन संस्कार ओर देह आदि का, जो उसकी उत्पत्ति के आधार हैँ, वारण नहीं किया जा सकता

सर्ग सन्दर्भ

दूसरा सर्ग समाप्त तीसरा सर्ग ब्रह्मा स्वयं मनोरूप है ओर उसका संकल्परूप यह जगत्‌ है, इसलिए यह मनोराज्य के समान असत्‌ ही है ।