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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 3, Verses 3–4

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 3, verses 3–4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 3 · श्लोक 3 ,4

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । पूर्वदेहोऽस्ति यस्याद्य पूर्वकर्मसमन्वितः । तस्य स्मृतिः संभवति कारणं संसृतिस्थितेः ॥ ३ ॥ ब्रह्मणः प्राक्तनं कर्म यदा किंचिन्न विद्यते । प्राक्तनी संस्मृतिस्तस्य तदोदेति कुतः कथम् ॥ ४ ॥

हिन्दी अर्थ

ठीक है, पूर्व देह आदि की सिद्धि होने पर उससे अनुभूत को विषय करनेवाली स्मृति ब्रह्मा के शरीर मे कारण होगी, पर पूर्व शरीर आदि की ही सिद्धि नहीं होती, ऐसा श्रीवसिष्ठजी कहते हैं । श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे रामचन्द्रजी, जिसका पूर्व जन्मों में उपार्जित कर्मों से युक्त पूर्व शरीर है, इस जन्म में उसी को संसारस्थिति की कारणभूत स्मृति हो सकती है। जब कि ब्रह्मा का प्राक्तन (पूर्वजन्म में उपार्जित) कर्म तनिक भी नहीं है, तो उनको पूर्वजन्म की स्मृति कहाँ से और कैसे होगी ?