Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 3, Verses 5–6
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 3, verses 5–6 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 3 · श्लोक 5, 6
संस्कृत श्लोक
तस्मादकारण भाति वा स्वचित्तैककारणम् ।
स्वकारणादनन्यात्मा स्वयंभूः स्वयमात्मवान् ॥ ५ ॥
आतिवाहिक एवासौ देहोऽस्त्यस्य स्वयंभुवः ।
न त्वाधिभौतिको राम देहोऽजस्योपपद्यते ॥ ६ ॥
हिन्दी अर्थ
शंका: तद्धैतल्लोकजिदेव” (वह यह प्राणदर्शन कर्मराहित यानी केवल भी लोकका साधन
ही होता है ) इत्यादि श्रुतियों से और “जैसा संकल्पवाला इस लोकमें पुरुष होता है वैसा ही वह
यहाँ से मरकर होता है, ऐसी व्यवस्था देखी गई है ऐसा जाननेवाला पुरुष क्रतु (अविचल
अध्यवसाय) करे ।* यों श्रुति में प्रदर्शित क्रतुन्याय से यह प्रसिद्ध है कि हिरण्यगर्भ का पद कर्म
और उपासना के समुच्चय का फल है, फिर हिरण्यगर्भ की प्राक्तन देह की वासनाएँ नहीं है,
यह कथन तथा हिरण्यगर्भ का मनोमय देह पृथिव्यादिमय नहीं है, यह कथन कैसे घट सकता
है 2 क्योकि “अन्नमयं हि सोम्य मन: (हे सोम्य, मन अन्न का विकार है) इस सिद्धान्त से भी
विरोध होता है ।
समाधान. ठीक है, अज्ञानी की दृष्टि से ही पूर्व देहकी वासनाओं की एवं मनकी अन्नमयता
की प्रतीति होती है। परन्तु "यन्मदन्यन्नास्ति कस्मानु बिभेमीति” (जब मुझसे अन्य कोड नही
है तब मैं किससे उर), ज्ञानमप्रतिध॑ं यस्य वैराग्यं व जयत्यते: । ऐश्वर्य वैव धर्मश्च सहसिद्धं
चतुष्टयम् ।* (जिस प्रजापतिका अप्रतिबद्ध ज्ञान, वैराग्य, ऐश्वर्य और धर्म स्वाभाविक है ।)
इत्यादि श्रुति और स्मृति में प्रसिद्ध उसकी तत्त्वद्ृष्टि से तो भूत, वर्तमान और भविष्यत् प्रपंच
नथा, न है और न होगा यों जगत् का त्रैकालिक बाध होने के कारण उसमें पूर्व देह की वासना
नहीं है, यह कहा गया है। बाधित की अनुवृत्ति होती है, इस पक्ष में तो मनमें और मनोमय ब्रह्मा
के शरीरमें, जले हुए वस्त्रमें तन्तुमयता समान पृथिव्यादिमयता पूर्व की नाई नहीं है, इसलिए
कोई विरोध नहीं है जब अबाधित अज्ञान के संकल्प से जनित नगर आदिकी सत्यता या
भौतिकता नहीं है, तब तत्त्वज्ञान से बाधित तथा अनुवृत्त ब्रह्मा के मन के संकल्प से उत्पन्न
विश्वकी सत्यता तथा भौतिकता नहीं है, इसमें तो कहना ही क्या 2 इस अभिप्राय से आगे कहे
जानेवाले जगत् के मिथ्यात्व में उपायभूत होने के कारण तत्त्वव्ृष्टिका अवलम्बन कर ही
प्राक्तन देह की वासनाओं का अपलाप किया गया है, यह भाव है ।
इसलिए ब्रह्मा का शरीर पृथिवी आदि कारण से शून्य है अथवा जीवका चित्त ही उसका
एकमात्र कारण है । वह अपने कारण चिद्घन परब्रह्म परमात्मा से अभिन्न, स्वयम्भू और स्वयं
आत्मरूप है । हे श्रीरामजी, इस स्वयम्भू ब्रह्मा की आतिवाहिक देह ही (५5) है, अजन्मा की
आधिभौतिक (स्थूल भूतों से उत्पन्न) देह हो ही नहीं सकती