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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 3, Verses 26–27

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 3, verses 26–27 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 3 · श्लोक 26-27

संस्कृत श्लोक

अजस्य सहकारीणि कारणानि न सन्ति यत् । तज्जस्यापि न सन्त्येव तानि तस्मात्तु कानिचित् ॥ २६ ॥ कारणात्कार्यवैचित्र्यं तेन नात्रास्ति किंचन । यादृशं कारणं शुद्धं कार्य तादृगिति स्थितम् ॥ २७ ॥

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार “अन्नेन सोम्य शुगेनापो मूलमन्विच्छ“ (हे सौम्य, अन्नरूप कार्य से कारण जल को खोजो) इस श्रुति में प्रदर्शित न्याय से जगत्‌ मनोमात्र है ओर मन ब्रह्ममात्र है, इस प्रकार अद्वैत ब्रह्म फलित हुआ, ऐसा कहते हैं । चूँकि अज के सहकारी कारण नहीं है, इसलिए उससे उत्पन्न हुए विश्व के भी कोई सहकारी कारण नहीं है | यहाँ पर कारण से कार्य में कोई भी वैचित्र्य नहीं है, इसलिए जैसे शुद्ध कारण है, वैसे कार्य भी शुद्ध ही है, ऐसा निश्चित हुआ