Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 30, Verses 26–31
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 30, verses 26–31 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 30 · श्लोक 26-31
संस्कृत श्लोक
केचिद्विचित्रसर्गेशाः केचित्तिर्यङ्मयान्तराः ।
केचिदेकार्णवापूर्णा इतरे जनिवर्जिताः ॥ २६ ॥
केचिच्छिलाङ्गनिष्पिण्डाः केचित्कृमिमयान्तराः ।
केचिद्देवमया एव केचिन्नरमयान्तराः ॥ २७ ॥
केचिन्नित्यान्धकाराढ्यास्तथा शीलितजन्तवः ।
केचिन्नित्यप्रकाशाढ्यास्तथा शीलितजन्तवः ॥ २८ ॥
केचिन्मशकसंपूर्णा उदुम्बरफलश्रियः ।
नित्यं शून्यान्तराः केचिच्छून्यस्पन्दात्मजन्तवः ॥ २९ ॥
सर्गेण तादृशेनान्ये पूर्णा येऽन्तर्धियामिह ।
कल्पनामपि नायान्ति व्योमपूर्णाचलो यथा ॥ ३० ॥
तादृगम्बरमेतेषां महाकाशं ततं स्थितम् ।
आजीवितं प्रगच्छद्भिर्विष्ण्वाद्यैर्यन्न मीयते ॥ ३१ ॥
हिन्दी अर्थ
कुछ ब्रह्माण्ड विचित्र सृष्टि और विचित्र
अधिपतिवाले हैं, कुछ ब्रह्माण्ड प्राणियों के कर्म और वासनाओं के विलक्षण होने से एवं
सृष्टिकर्ताओं की इच्छा और ज्ञान के विचित्र होने से पशु-पक्षियों से ही भरे हैं, कुछ
ब्रह्माण्ड केवल एकमात्र समुद्र से भरे हैं, कुछ जीव-जन्तुओं से शून्य हैं, कुछ ब्रह्माण्ड
शिला के तुल्य निविड हैं, कुछ के अन्दर कीड़े-ही-कीड़े हैं, कुछ में देवताओं का ही
आवास है और कुछ में मनुष्य ही प्रचुरमात्रा में रहते हैं, कुछ कभी नष्ट न होनेवाले अन्धकार
से आवृत्त हैं, उनमें वैसे ही प्राणी दृष्टिगोचर होते हैं, क्योंकि उल्लुओं का अँधेरे में
दर्शनव्यवहार देखा जाता है; कुछ सदा प्रकाश से पूर्ण हैं, उनमें वैसे ही प्राणी दृष्ट होते हैं।
कुछ गूलर के फल की तरह मच्छरों से परिपूर्ण हैं, कुछ ब्रह्माण्डों का मध्यभाग सदा शून्य
रहता है, कुछ के जीव गतिशून्य हैं । पूर्वोक्त प्रकार की सृष्टिसे पूर्ण कुछ दूसरे ब्रह्माण्ड
आकाश से पूर्ण पर्वत की नाईं योगियों की सविकल्पकज्ञानविषयता को भी प्राप्त नहीं होते ।
आकाश से पूर्ण पर्व के समान आकाश शून्य स्वभाव है ओर महाकाश तो वैसा विस्तृत है
कि यदि विष्णु आदि अपनी आयुभर यदि कितना बड़ा है, यह जानने के लिए दौड़े तो भी
उसकी सीमा नहीं जान सकते