Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 30, Verse 32
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 30, verse 32 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 30 · श्लोक 32
संस्कृत श्लोक
प्रत्येकस्याण्डगोलस्य स्थितः कटकरत्नवत् ।
भूताकृष्टिकरो भावः पार्थिवः स्वस्वभावतः ॥ ३२ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि कोड शंका करे कि भले ही अनन्त ब्रह्माण्ड हों और परस्पर विलक्षण भी हों, लेकिन
उनके बाहर स्थित जलादि आवरण को, उनको धारण न करने के कारण उनका विश्लेषण
क्यो नहीं होता, ऐसी शंका कर पूर्वोक्ति आकर्षण शक्ति का अवलम्बन कर उनका विश्लेषण
नहीं होता, ऐसा समाधान करते हैं।
अपने स्वभाव से ही प्रत्येक ब्रह्माण्डगोलक की भूतों को आकृष्ट करनेवाली एक प्रकार की
शक्ति वलय में जड़े हुए रत्न के समान चारों और से व्याप्त कर स्थित हैं, इस कारण उनका
विश्लेषण नहीं होता