Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 30, Verses 3–4
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 30, verses 3–4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 30 · श्लोक 3,4
संस्कृत श्लोक
तादृशावरणान्सर्गान्ब्रह्माण्डेषु ददर्श सा ।
कोटिशः स्फुरितान्व्योम्नि त्रसरेणूनिवातपे ॥ ३ ॥
महाकाशमहाम्भोधौ महाशून्यत्ववारिणि ।
महाचिद्द्रवभावोत्थान्बुद्बुदानर्बुदप्रभान् ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे आकाश में, धूप में, करोड़ों त्रसरेणु दृष्टिगोचर होते हैं वैसे
ही लीला ने सब ब्रह्माण्डों में वैसे आवरणवाली करोड़ों सृष्टियों को देखा, जो कि स्वप्रकाश
अधिष्ठान चैतन्य से भासित थी । अविद्यारूप जल से परिपूर्ण महाकाशरूपी महासागर में
महाचेतन्य के स्फुरणरूप द्रवीभाव से उत्पन्न असंख्य ब्रह्माण्डरूपी बुद्बुदों को लीला ने
देखा