Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 30, Verses 5–8
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 30, verses 5–8 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 30 · श्लोक 5-8
संस्कृत श्लोक
कांश्चिदापततोऽधस्तात्कांश्चिच्चोपरि गच्छतः ।
कांश्चित्तिर्यग्गतीनन्यान्स्थितांस्तब्धान्स्वसंविदा ॥ ५ ॥
यत्र यत्रोदिता संविद्येषां येषां यथा यथा ।
तत्र तत्रोदितं रूपं तेषां तेषां तथा तथा ॥ ६ ॥
नेहैव तत्र नामोर्ध्वं नाधो न च गमागमाः ।
अन्यदेव पदं किंचित्तस्माद्देहागमं हि तत् ॥ ७ ॥
उत्पद्योत्पद्यते तत्र स्वयं संवित्स्वभावतः ।
स्वसंकल्पैः शमं याति बालसंकल्पजालवत् ॥ ८ ॥
हिन्दी अर्थ
इस प्रकार के हजारो करोड ब्रह्माण्ड हैं, क्योकि प्रधान यानी अधिष्ठान चैतन्य सर्वगामी
है, इसलिए वे तिरे, ऊपर, नीचे, सव जगह स्थित हैं, इस पुराणवचन के अनुसार कहते हैं ।
उसने तत्-तत् ब्रह्माण्डों के अभिमानी जीवों के ज्ञानानुसार उनमें से कुछ को नीचे गिरते
हुए, कुछको ऊपर उडते हुए, कुछ को तिरछे चलते हुए और कुछ को निश्चलरूपसे स्थित
देखा । जिन-जिनकी जहाँ-जहाँ पर जैसी भावना हुई, उन -उन की दृष्टि में वहाँ-वहाँ पर
वैसा-वेसा रूप उदित हुआ । यह अनुभव करनेवालों की दृष्टि से कहा गया हे, वास्तव में
चिदाकाश में ओर ब्रह्माण्डमें भी कुछ नहीं हे, न तो ऊपर का प्रदेश है, न नीचे का प्रदेश है
ओर न ब्रह्माण्डों के गमन-आगमन ही हैं, किन्तु वाणी ओर मन का अगोचर दिग्विभाग आदि
सब द्वैतो से रहित दूसरी ही वस्तु है, इसलिए जो ब्रह्माण्डं का वर्णन किया है, वह अज्ञानी
लोगों की दृष्टि के अभिप्राय से किया है, ऐसा समझना चाहिए । स्वयं संवित् ही अविद्यासे
उत्पन्न अपने संकल्पो से, बालकों के संकल्पो की नाई उत्पन्न सी होती है और उत्पन्न होकर
शान्त सी होती है