Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 31, Verses 31–32
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 31, verses 31–32 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 31 · श्लोक 31
संस्कृत श्लोक
ये हि राज्ञामराज्ञां वाप्ययथाशास्त्रकारिणाम् ।
रणे म्रियन्ते छिन्नाङ्गास्ते वै निरयगामिनः ॥ ३१ ॥
धर्म्यं यथा तथा युद्धं यदि स्यात्तर्हि संस्थितिः ।
नाशयेयुरलं मत्ताः परलोकभयोज्झिताः ॥ ३२ ॥
हिन्दी अर्थ
प्रजाओं के प्रति सदा कुछ न कुछ उपद्रव करने वाले राजा अथवा राजा से
भिन्न जमींदार आदि राजा के लिए जो युद्ध में मरते हैं, वे निस्सन्देह नरकगामी होते हैं ॥ ३ ०॥
शास्त्रानुकूल आचरण न करनेवाले का आश्रय लेना ही नरक का हेतु है, उस पर यदि वह
प्रजाओं के प्रति उपद्रव करनेवाला हो, तो उसका आश्रय लेना नरक का हेतु है, इसमें कहना
ही क्या है ? इस आशय से फिर पूर्वोक्ति बात को कहते हैं।
शास्त्रानुकूल आचरण न करनेवाले और प्रजा को पीड़ित करनेवाले राजाओं अथवा राजाओं
से भिन्न मालिकों की विजय के लिए जो रण में छिन्न-भिन्न शरीर होकर मरते हैं, वे निश्चय
नरकगामी होते हैं