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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 34, Verses 27–28

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 34, verses 27–28 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 34 · श्लोक 27,28

संस्कृत श्लोक

विविधायुधसंघट्टखण्डितोग्रास्थिकोटयः । खे कवन्त्यः कणत्कारैः प्रसृतास्तारका इव ॥ २७ ॥ व्योम्नि जीवनदीवाहे वहत्सायकवारिणि । चक्रावर्तिनि गच्छन्ति गिरयोऽप्यणुपङ्कताम् ॥ २८ ॥

हिन्दी अर्थ

विविध आयुधों की चोट लगने से ट्टी हुईं असंख्य बड़ी-बड़ी हड्डियाँ, जो कि कणत्कार से (कण-कण शब्द से) शब्दायमान हैं, आकाशमें व्याप्त तारिका सी प्रतीत होती हैँ । जीवरूपी नदी प्रवाह वाले, बाणरूपी जलवाले तथा चक्ररूपी आवर्तवाले आकाशरूपी सागर में बड़े बड़े पर्वत भी अणुरूपताको प्राप्त हो रहे हैं