Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 34, Verses 22–26

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 34, verses 22–26 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 34 · श्लोक 22-26

संस्कृत श्लोक

कान्तकाञ्चनकान्ताङ्गे भटस्योरसि कामिनी । दृष्टा देवपुरन्ध्रीयं भर्तुरन्वेषणान्विता ॥ २२ ॥ हा हतं सैन्यमस्माकं भटैऽरुद्धतमुष्टिभिः । महाप्रलयकल्लोलैः सुरशैलस्थलं यथा ॥ २३ ॥ युध्यध्वमग्रतो मूढा नयतार्धमृतान्नरान् । निजान्पादप्रहारेण मैतान्दारयताधमाः ॥ २४ ॥ धम्मिल्लवलनाव्यग्रे घनोत्कण्ठेऽप्सरोगणे । भटो दिव्यशरीरेण पार्श्वप्राप्तो निरीक्ष्यताम् ॥ २५ ॥ फुल्लहेमारविन्दासु च्छायाशीतजलानिलैः । स्वर्गनद्यास्तटीष्वेनं दूरायातं विनोदय ॥ २६ ॥

हिन्दी अर्थ

जो योद्धा की पत्नी स्वतः सुन्दर और स्वर्णाभरणों से सुन्दर पति के वक्षःस्थल में मरी हुई देखी गई थी, वह यह अप्सरा होकर भर्ता की खोज में तत्पर दिखाई देती है। जैसे महाप्रलय के कल्लोलों से सुमेरु पर्वत आहत होता है, वैसे ही उद्धत मुष्टिवाले योद्धाओं से हमारी सेना मारी जाती है, बड़ा खेद है, यह कातर पुरुष की उक्ति है हे मूढ़ों, आगे बढ़कर लड़ो अपने घायल सैनिकों को ले जाओ, अधमो, इन बेचारों को पैरों के प्रहार से मत कुचल डालो केशपाश की रचना में व्यग्र अत्यन्त उत्कण्ठित अप्सराओं के समुदाय में दिव्य शरीर से समीप में प्राप्त हुए इस योद्धा को देखिये । जिनमें सुवर्णससदूश कमल विकसित हुए हैं, ऐसे मन्दाकिनी के तटों में छाया, जल और वायु से दूर से आये हुए इस रणयोद्धाओं को विश्राम कराओ