Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 34, Verses 46–47
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 34, verses 46–47 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 34 · श्लोक 46,47
संस्कृत श्लोक
अनन्तरक्तसंसक्तसन्नावनितलायुधैः ।
भुवनं भात्यभिज्वालमग्निलोक इवाकुलम् ॥ ४६ ॥
भुशुण्डीशक्तिशूलासिमुसलप्रासवृष्टयः ।
अन्योन्यच्छेदभेदाभ्यां करप्रकरतोऽपतन् ॥ ४७ ॥
हिन्दी अर्थ
असंख्य, रुधिर से लथपथ, टूटे-फूटे भूखण्डों
और अस्त्र-शस्त्रो से व्याप्त भुवन अग्निलोक की नाई चारों ओर से उठी हुई ज्वालाओं से
युक्त सा प्रतीत होता हे । उस युद्ध स्थल में परस्पर एक दूसरे को काटने ओर छेदन के लिए
उद्यत हस्तसमूहों से भुशुण्डी (एक प्रकार का अस्त्र) शक्ति, त्रिशूल, तलवार, मूसल और
भालों की वृष्टियाँ गिरती थी