Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 34, Verse 50
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 34, verse 50 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 34 · श्लोक 50
संस्कृत श्लोक
अन्योन्यरणहेत्युग्रचूर्णपूर्णो रणार्णवः ।
वालुकामय एवाभूच्छिन्नच्छत्रतरङ्गकः ॥ ५० ॥
हिन्दी अर्थ
कटे हुए
छाते ही जिसमें तरंग से प्रतीत हो रहे हैं, ऐसा परस्परयुद्ध में प्रयुक्त अस्त्र-शस्त्रों के प्रचुर
चूर्ण से परिपूर्ण रणभूमिरूप सागर बालूकामय ही हो गया है