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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 34, Verse 51

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 34, verse 51 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 34 · श्लोक 51

संस्कृत श्लोक

सरभसरसवद्विसारितूर्यप्रतिरवपूरितलोकपाललोकः । रणगिरिरयमुग्रपक्षदक्षप्रतिसृतिवृत्त इवाम्बरे युगान्ते ॥ ५१ ॥

हिन्दी अर्थ

जिसने मधुर फैलनेवाले ओर तुरही आदि बाजों की प्रतिध्वनियों से वेग के साथ लोकपालों के लोक को भर दिया है, ऐसा रणरूपी यह पर्वत प्रलयकाल में युद्ध में कठोर हुए दो सेनारूपी परों के प्रबल परस्पर प्रतिकूल संचलन से आकाश में उड़ने के लिए तैयार हुआ-सा प्रतीत होता है