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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 36, Verses 11–17

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 36, verses 11–17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 36 · श्लोक 11-17

संस्कृत श्लोक

मिलिताश्चक्रिणश्चक्रैर्धनुर्धारैर्धनुर्धराः । खङ्गिभिः खङ्गयोद्धारो भुशुण्डीभिर्भुशुण्डयः ॥ ११ ॥ मुसलैर्मुसलोदाराः कुन्तिनः कुन्तिधारिभिः । ऋष्ट्यायुधा ऋष्टिधरैः प्रासिभिः प्रासपाणयः ॥ १२ ॥ समुद्गरा मुद्गरिभिः सगदैर्विलसद्गदाः । शाक्तिकैः शक्तियोद्धारः शूलैः शूलविशारदाः ॥ १३ ॥ प्रासासनविदः प्रासैः परशूक्ताः परश्वधैः । लकुटोद्यैर्लकुटिनश्चोपलैरुपलायुधाः ॥ १४ ॥ पाशिभिः पाशधारिण्यः शङ्कुभिः शङ्कुधारिणः । क्षुरिकाभिस्तु क्षुरिका भिन्दिपालैश्च तद्गताः ॥ १५ ॥ वज्रमुष्टिधरा वज्रैरङ्कुशैरङ्कुशोद्धताः । हलैर्हलनिकाषज्ञास्त्रिशूलैश्च त्रिशूलिनः ॥ १६ ॥ श्रृङ्खलाजालिनो जालैः श्रृङ्खलैरलिकोमलैः । क्षुभिताकल्पविक्षुब्धसागरोर्मिघटा इव ॥ १७ ॥

हिन्दी अर्थ

से, कुल्हाड़ों के वार में प्रसिद्धि प्राप्त योद्धाओं ने कुल्हाड़ाधारी योद्धाओं से, दण्डधारियों ने बाँसों के बड़े-बड़े डण्डों को हाथों में उठाये हुए योद्धाओं से, पत्थरों से लड़नेवाले योद्धाओं ने पत्थरों से लड़नेवाले योद्धाओं से, पाश (जाल) धारी योद्धाओंने पाशधारियों से, कील धारण करनेवाले योद्धाओं ने कील धारियों से, छूरे धारण करनेवाले योद्धाओं ने री धारण करनेवाले योद्धाओं से, भिन्दिपाल धारण करनेवाले योद्धाओं ने भिन्दिपालधारियों से, वज्ररूप मुष्टि को धारण करनेवाले योद्धाओं ने वज़रूपी मुष्टि को धारण करनेवाले योद्धाओं से, अंकुशों से उद्यत यानी अंकुशयुद्ध में विशारद योद्धाओं ने अंकुशधारी योद्धाओं से, हल से युद्ध करने में अभिज्ञ योद्धाओं ने हलधारियों से, त्रिशूलधारियों ने त्रिशूलधारियों से, कवच की नाई लोहे की जंजीरों के जालीदार कोट श्रृंखलाजाल कहलाता है, उसको पहने हुए घुड़सवार योद्धाओं ने जालदार कवच पहने हुए घुड़सवारों से ऐसे युद्ध किया जैसे कि प्रलयकाल में विक्ष॒ुब्ध महासागर की आकाश-पाताल एक करनेवाली बड़ी-बड़ी लहरों की घटाएँ आपस में टकराती हैं