Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 36, Verse 18
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 36, verse 18 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 36 · श्लोक 18
संस्कृत श्लोक
क्षुब्धचक्रदलावर्तः शरसीकरमारुतः ।
प्रभ्रमद्धेतिमकरो व्योमैकार्णव आबभौ ॥ १८ ॥
हिन्दी अर्थ
वह युद्धाकाशरूपी एकमात्रसागर अति सुशोभित हुआ । उसमें वार करने के
लिए व्याकुल चक्रों की राशियाँ ही आवर्तं थे, वायु बाणरूपी जलकणों से युक्त थे, आयुधरूपी
मगर इधर-उधर घूम रहे थे