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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 36, Verses 40–43

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 36, verses 40–43 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 36 · श्लोक 40-43

संस्कृत श्लोक

अथ प्रत्यग्दक्षिणस्यां महाराज्यसुराष्ट्रकाः । सिन्धुसौवीरशूद्राख्या आभीरा द्रविडास्तथा ॥ ४० ॥ कीकटाः सिद्धखण्डाख्यास्तथा कालिरुहा अपि । अत्र हेमगिरिः शैलस्तथा रैवतको गिरिः ॥ ४१ ॥ जयकच्छो मयवरो यवनास्तत्र जन्तवः । बाह्लीका मार्गणावन्ता धूम्रास्तुम्बकनामकाः ॥ ४२ ॥ तथा लाजगणाश्चैव तथात्र गिरिवासिनः । ततोऽब्धितोकनियुता एते लीलापतेर्जनाः ॥ ४३ ॥

हिन्दी अर्थ

पश्चिम ओर दक्षिण दिशा के मध्य में महाराज्य, सुराष्ट्र, किन्थुस सौवीरस शूद्र, आभीर, द्रविड, कीकट, सिद्धखण्ड, कालिरूहस सुमेरु पर्वत, रैवतक पर्वत, यकज्छ, मयवर, जिसमें यवन रहते थे, ये चार पर्वत, बाहूलीकस मार्गणावन्त, ध्र, तुम्बक, लाजगण ओर उक्त दिशा के पर्वत के निवासी, तथा समुद्रतट के ओर तोकनि देश के निवासी, हे श्रीरामचन्द्रजी, ये सब पूर्वोक्त लीला के पति के पक्ष के थे