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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 37, Verses 18–19

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 37, verses 18–19 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 37 · श्लोक 18, 19

संस्कृत श्लोक

दशार्णाः पाशनिर्मुक्तश्रृङ्खला जालभीरवः । निलीना रक्तजम्बाले वैतसास्तिमयो यथा ॥ १८ ॥ गुर्जरानीकनाशेन गुर्जरीकेशलुञ्चनम् । विहितं तङ्गणोत्तुङ्गनासिशङ्कुशतै रणे ॥ १९ ॥

हिन्दी अर्थ

पाशदेशवासियों द्वारा छोड़े गये श्रृंखलाजाल से भयभीत दाशार्ण लोग जैसे बेंत की अडियो की जड़ों मेँ रहनेवाली मछलियाँ कीचड़ में छिप जाती हे वैसे ही रक्त रूपी कीचड़ में छिप गये तंगण लोगों के ऊपर उछले हुए खड्गों और शंखशतनामक शस्त्रो ने रणभूमि में गुर्जरसेना के विनाश से गुर्जरस्त्रियों के केशों का लुंचन करा दिया