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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 37, Verse 31

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 37, verse 31 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 37 · श्लोक 31

संस्कृत श्लोक

काशैस्तद्देहकाः क्रांता अदृश्यैर्मायया खगैः । निर्धूतपक्षैः क्षुभितैः पवनैरिव पांसवः ॥ ३१ ॥

हिन्दी अर्थ

माया से पक्षी बने हुए अदृश्य समुद्री मनुष्यों ने फैलाये हुए अपने परों से तद्देहकवासी लोगों पर ऐसा आक्रमण किया जैसा कि क्षुभित झंझावात धूलिकणों पर आक्रमण करता है