Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 37, Verses 37–38
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 37, verses 37–38 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 37 · श्लोक 37,38
संस्कृत श्लोक
ब्रह्मावत्सनका नीपैश्चक्रैः कृत्ता गता महीम् ।
सहयाः क्रकचोन्कृत्ता वृक्षाः कुसुमिता इव ॥ ३७ ॥
श्वेतकाकाननं लूनं कुठारैर्जठरेरितैः ।
एतद्ददाह पार्श्वस्थो भद्रेशः शरवह्निना ॥ ३८ ॥
हिन्दी अर्थ
नीपदेशवासियों द्वारा चक्रों से काटे गये अतएव
घोड़ों के साथ पृथिवी में गिरे हुए ब्रह्मावत्सनदेश के सैनिक आरो से काटे गये, फूले हुए वृक्षों
की नाई प्रतीत होते थे । जठरदेशीय योद्धाओं से प्रेरित (फेंके गये) कुल्हाड़ों ने श्वेतकाकदेश
रणसमाप्ति में या रण के आरम्भ मेँ जो आसवपान होता है, वीरपान कहा जाता है ।
के योद्धाओं के सिर काट डाले और जठरदेशीयों की सेना को पास में स्थित मद्रदेश के राजा
ने बाणरूपी अग्नि से जला डाला