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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 37, Verse 49

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 37, verse 49 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 37 · श्लोक 49

संस्कृत श्लोक

शालतालवनं प्राप्य जनतावलनं वनम् । भुजावकर्तनं चासीदुत्तालं स्थाणुकाननम् ॥ ४९ ॥

हिन्दी अर्थ

शाल का वन और तालका वन युद्ध में परस्पर दो जनसमूहों के सम्मेलन से महावनरूप में परिणत युद्धस्थान को प्राप्त होकर और वहाँ बाहुच्छेदन और मस्तकच्छेदन को प्राप्त होकर क्रमश: ऊँचे तालवृक्षप्राय और स्थाणुओं का वन हुआ | भाव यह कि शालों के चारों ओर की शाखाओं के काटने पर ताल सरीखे पेड़ हो जाते हैं और तालों की चोटी काट देने से स्थाणुता ही बच जाती है, अत: शालका वन जो तालवन बना और जो तालवन स्थाणुओं का वन बना वह ठीक ही बना