Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 37, Verses 53–54

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 37, verses 53–54 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 37 · श्लोक 53,54

संस्कृत श्लोक

जहुर्भग्नेश्वराः कान्ति तां जिगीषवनौजसा । कासयः कमलानीव शुष्कस्रोतस्विनौजसा ॥ ५३ ॥ तुषाका मेसलैः कीर्णाः शरशक्त्यसिमुद्गरैः । विद्रुता नरकैः क्षिप्ताः कटकच्छलना अपि ॥ ५४ ॥

हिन्दी अर्थ

जिसने तालाबों को भरनेवाले झरनों को सुखा दिया ऐसे ग्रीष्म, ऋतु के प्रभाव से जैसे कमल अपनी कान्ति को खो बैठते हैं वैसे ही तांजिगीयवनदेशीय योद्धाओं के प्रताप से काशिदेश के योद्धाओं ने, जिनके कि स्वामी मर चुके थे, कान्ति खो दी । मेखल देशवासियों ने तुषाकदेशीय योद्धाओं के ऊपर बाण, शक्ति, तलवार ओर मुद्गरो की वृष्टि की । नरकदेशीय योद्धाओं द्वारा शस्त्रास्त्रं से आक्रान्त कटकच्छेलनदेश के योद्धा भी भाग गये