Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 38, Verses 17–24
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 38, verses 17–24 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 38 · श्लोक 17-24
संस्कृत श्लोक
क्रमेणासीन्मुहूर्तेन विकटोदरभीषणम् ।
अगस्त्यपीतार्णववच्छून्यमेव रणाङ्गणम् ॥ १७ ॥
शवसन्ततिसंपूर्णं वहद्रक्तनदाकुलम् ।
परिकूजनझङ्कारपूर्णझिल्लिवनोपमम् ॥ १८ ॥
बहद्रक्तसरित्स्रोतस्तरङ्गारवघर्घरम् ।
साक्रन्दार्धमृताहूतसप्राणव्यग्रमानवम् ॥ १९ ॥
मृतार्धमृतदेहौघसृतासृक्प्लुतनिर्झरम् ।
सजीवनरपृष्ठस्थशवस्पन्दनभ्रान्तिदम् ॥ २० ॥
करीन्द्रशवराश्यग्रविश्रान्ताम्बुदखण्डकम् ।
विशीर्णरथसंघातं वातच्छिन्नमहावनम् ॥ २१ ॥
वहद्रक्तनदीरंहःप्रोह्यमानहयद्विपम् ।
शरशक्त्यृष्टिमुसलगदाप्रासासिसंकुलम् ॥ २२ ॥
पर्याणावनसंनाहकवचावृतभूतलम् ।
केतुचामरपट्टौघगुप्तं शवशरीरकम् ॥ २३ ॥
फणास्फुटकतूणीरकुञ्जकूजत्समीरणम् ।
शवराशिपलालौघतल्पसुप्तपिशाचकम् ॥ २४ ॥
हिन्दी अर्थ
थोड़ी देर में जैसे जैसे सैनिक निकलते गये, वैसे वैसे रणभूमि पूतनेश्वरी
के पेट के समान भीषण और अगस्त मुनि द्वारा पिये गये सागर के समान शून्य (रिक्त) ही हो
गई । सारी रणभूमि मुर्दो से पटी थी, जहाँ तहाँ रुधिर के नद बह रहे थे, घायल एवं मरणासन्न
सैनिकों के रोदन और कराहने से वह पूर्ण थी अतएव वनमक्खियों की भनभनाहट से भरे हुए
वनमक्खियों के वन के सदुश लगती थी, बह रही रुधिर नदियों के प्रवाह और तरंगों के शब्द
से उसमें घर घर ध्वनि हो रही थी, रो रहे, चिल्ला रहे अधमरे लोगों द्वारा पुकारे गये जीवित
पुरुष बड़े व्यग्र थे, मरे हुए और अधमरे लोगों के शरीरों से चू रहे खून के झरने बह रहे थे,
सजीव (अधमरे) पुरुषों की पीठ में पड़े हुए शवों (मुर्दो) में स्पन्दन का भ्रम होता था, मत्त
मातंगों के शवों के ढेर की चोटी पर मेघखण्ड विराजमान थे, वहाँ अनेक रथ जहाँ तहाँ बिखरे
थे, अतएव वह रणस्थल उस महावन के तुल्य प्रतीत होता था, जिसमें आँधी से वृक्ष ढह गये
हों, वहाँ बह रही रुधिर नदी के प्रवाह में हाथी, घोड़े बह रहे थे, बाण, शक्ति, ऋष्टि, मुसल,
गदा, भाले और तलवारों से सारी रणभूमि पटी थी, काठी, शरीर के रक्षक चमड़े के टुकड़े और
कवचों से सारा भूतल व्याप्त था, शवों के शरीर, पताका, चँवर और घाव बाँधने की पट्टियों से
आच्छन्न था, साँपकी फन के समान जिनका आगे का हिस्सा ऊँचा था और जिनमें छलनी के
समान चारों ओर छिद्र किये गये थे ऐसे तरकसों में वायु इस प्रकार शब्द करता था जैसे कि
कीचक की (एक प्रकार के बाँस की) झाड़ियों में करता है, वहाँ पर पिशाच शवों की राशिरूप
पुआल के बिछौने पर सोये थे