Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 38, Verse 58
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 38, verse 58 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 38 · श्लोक 58
संस्कृत श्लोक
विवृत्तासंख्याश्वद्विरदपुरुषाधीश्वररथप्रकृत्तोष्ट्रग्रीवाप्रसृतरुधिरोद्गारसुसरित् ।
रणोद्यानं मृत्योस्तदभवदशुष्कायुधलतं सशैलं कल्पान्ते जगदिव विपर्यस्तमखिलम् ॥ ५८ ॥
हिन्दी अर्थ
वह रणभूमि क्या थी
मृत्यु का उद्यान था । मर कर इधर उधर गिरे हुए असंख्य घोडे, हाथी, नर, नरपति, रथ और
काटी गई ऊँटों की गरदनों से निकले हुई रुधिर के प्रवाह से सुन्दर अनेक नदियाँ वहाँ पर बह
रही थी, खून से लथपथ (गीले) हथियार ही लताएँ थी। उक्त रणोद्यान प्रलयकाल में शेलयुक्त
जगत् के समान सम्पूर्णं विध्वस्त हो गया था