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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 4, Verses 21–22

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 4, verses 21–22 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 4 · श्लोक 21,22

संस्कृत श्लोक

उदभूदभितः संध्या तारानिकरधारिणी । उत्फुल्लकिंशुकवना वसन्तश्रीरिवोदिता ॥ २१ ॥ चूतनीपकदम्बाग्रग्रामचैत्यगृहोदरे । निलिल्यिरे खगाश्चित्तेऽवदाता वृत्तयो यथा ॥ २२ ॥

हिन्दी अर्थ

फूले हुए पलाश के वनों से पूर्ण वसन्तशोभा के समान उदित हुई तारागणोँ को धारण करनेवाली सन्ध्या चारों ओर से उद्भूत हो गई जैसे निर्मल चित्तवृत्तियाँ निद्रासे आवृत्त चित्त में लीन हो जाती हैं, वैसे ही पक्षी आम, कदम्ब आदि वृक्षों की चोटियोंमें तथा ग्राम के मन्दिरों में और घरों में लीन हो गये