Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 4, Verses 11–20
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 4, verses 11–20 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 4 · श्लोक 11-20
संस्कृत श्लोक
ततो वसिष्ठो भगवान्संहृत्य मधुरां गिरम् ।
अद्य तावन्महाराज श्रुतमेतावदस्तु वः ॥ ११ ॥
प्रातरन्यद्वदिष्यामि इत्युक्त्वा मौनवानभूत् ।
इत्याकर्ण्यैवमस्तूक्त्वा भूपतिर्भूतिवृद्धये ॥ १२ ॥
पुष्पपाद्यार्घसन्मानदक्षिणादानपूजया ।
सदेवर्षिमुनीन्विप्रान्पूजयामास सादरम् ॥ १३ ॥
अथोत्तस्थौ सभा सर्वा सराजमुनिमण्डला ।
मण्डलाकीर्णरत्नौघपरिवेषावृतानना ॥ १४ ॥
परस्पराङ्गसंघट्टरणत्केयूरकङ्कणा ।
हारभाराहृतस्वर्णपट्टाभोरुस्तनान्तरा ॥ १५ ॥
शेखरोत्सङ्गविश्रान्तप्रबुद्धमधुपस्वनैः ।
सघुंघुमशिरोभारा वदद्भिरिव मूर्धजैः ॥ १६ ॥
काञ्चनाभरणोद्द्योतकनकीकृतदिंग्मुखाः ।
बुद्धिस्थमुनिवागर्थसंशान्तेन्द्रियवृत्तयः ॥ १७ ॥
जग्मुर्नभश्चरा व्योम भूचरा भूमिमण्डलम् ।
चक्रुर्दिनसमाचारं सर्वे ते स्वेषु सद्मसु ॥ १८ ॥
एतस्मिन्नन्तरे श्यामा यामिनी समदृश्यत ।
जनसङ्गाद्विनिर्मुक्ता गृहे बालाङ्गना यथा ॥ १९ ॥
देशान्तरं भासयितुं ययौ दिवसनायकः ।
सर्वत्रालोककर्तृत्वमेव सत्पुरुषव्रतम् ॥ २० ॥
हिन्दी अर्थ
तदुपरान्त श्रीवसिष्ठजी ने अपनी मधुर वाणीका उपसंहार कर महाराज से कहा : महाराज,
आज आप लोग इतना ही सुनिए; शेष कल प्रातःकाल कहूँगा। - ऐसा कहकर वे मौन हो गये ।
उनके वचन को सुनकर राजाने “तथास्तु” कहकर अपने एश्वर्य की वृद्धि की कामना से पुष्प,
अर्घ, दक्षिणादान और यथायोग्य सम्मान द्वारा आदरपूर्वक देवता, ऋषि और मुनियों के साथ
सम्पूर्ण ब्राह्मणों की पूजा की । तदुपरान्त राजवृन्द और मुनिमण्डली के साथ सारी सभा उठ
खड़ी हुई। निःस्पृह मुनियों ने राजा द्वारा दिये गये बहुमूल्य रत्नों की उपेक्षा कर दी थी, अतएव
वे मण्डलाकार आवृत्त थे। परस्पर के अंगों की धक्काधुक्की से लोगों के बाजूबन्ध और कड़े
ठनक रहे थे। सब लोगों के वक्षःस्थल और स्तनान्तर हार तथा सुवर्णजड़ित रेशमी वस्त्रोंकी
कान्ति से विभूषित थे । बोल रहे केशों के सदश शेखर (सिर में तिरछी पहनी गई माला) के
मध्य में पहले विश्रान्त ओर इस समय प्रबुद्ध भँवरों की मधुर ध्वनि से लोगों का सिर "घुं घु
शब्दवाला हो रहा था । सुवर्ण के आभूषणों की कान्ति से लोगोंने दिशाओं को सुवर्णमय बना
दिया था । चित्त में स्थित महामुनि की वाणी के अर्थ से सबकी चित्तवृत्तिर्योँ शान्त थी । उन
सभ्यो में से जो आकाशचारी थे,वे आकाशको गये ओर भूलोकवारी थे वे भूमि में गये सवने
अपने-अपने घरों में जाकर दैनिक कृत्य किये । इसी बीच में जैसे यौवनमध्यस्था नारी
जनकोलाहल के निवृत्त होने पर धीरे-धीरे पतिगृह में गई हुई दिखलाई देती है, वैसे ही
जनसम्पर्क से शून्य काली रात्रि दिखाई दी । श्रीसूर्य भगवान् अन्य देश को प्रकाशित करने के
लिए चले गये, कारण कि सर्वत्र प्रकाश करना ही सत्पुरुषो का व्रत है